संगति का असर : Effect of Constansy |Inspiring Story In Hindi

बात उस समय की है जब राजा विक्रमादित्य उज्जैन के राजा थे | राजा विक्रमादित्य न्यायपालक न्यायप्रिय राजा थे |उन्होंने अपने राज्य में यह एलान करा रखा था कि – राज्य की बाजार में शाम तक जिस व्यक्ति का कोई भी सामन नहीं बिकेगा उस सामन को राजा , मंत्री और सैनिक जाकर उस वस्तु का उचित मूल्य देकर खरीद लेंगे जिससे उस व्यक्ति का धनाभाव के कारण कोई कार्य बाधित न हो |

एक बार राजा विक्रमादित्य के राज्य को बाजार में एक बहेलिया दो तोते बेचने आया | उसने तोते एक तोते का मूल्य पांच रूपये और दुसरे तोते का 50 रूपये बताया , दोनों तोते का रंग रूप आकर देखने में एक जैसा ही था , देखने में दोनों एक जैसे लगते थे |कई व्यक्तियों ने तोते वाले बहेलियो को ठग मानकर शाम तक किसी ने भी उसका तोता किसी ने नहीं खरीदा |

शाम को जब राजा के मंत्री व सैनिक एक एक कर व्यक्तियों के बचे सामान को खरीद रहे थे , तभी वे उस बहेलिये के पास भी पहुचे और दोनों तोतो का मूल्य पूछा तो बहेलिये ने एक तोते का मूल्य पांच रूपये और दुसरे तोते का 50 रूपये बताया , जिससे सभी लोग चकित रह गये | परन्तु राजा के आदेश के कारण वे तोते को खरीद कर लाये | मंत्रियो ने दोनों तोतो को राजा के सामने पेश किया तो राजा ने अपने शयन कक्ष में दोनों तोतो को अलग अलग खूटी पर टांगने का आदेश दिया |दोनों तोतो को खूटी पर टांग दिया गया | जो 50 रूपये वाला तोता था , वो जैसे ही सुबह होने लगी वह गीता के श्लोक गाने लगा , जब राजा ने तोते का श्लोक सुना तो उस लगा तोते का मूल्य अगर 5 हज़ार भी रख दिया जाता तब भी तोते का मूल्य कम होता | धोड़ी देर में दुसरे 5 रूपये वाले तोते ने राजा को गलियां बकनी शुरू कर दी – ए ! राजा तू उल्लू है आदि अपशब्द देना शुरु कर दिया |

यह सुनकर राजा तोते को तलवार से मारने को झपटे कि 50 रूपये वाले तोते ने रोका बोला – हे ! राजन इसमें इस तोते को कोई दोष नहीं है , वह निर्दोष है , दोष उसकी असंगति का है | इससे पहले भी हमें एक बहेलिये ने पकड़ा था , जिससे कि मुझे एक सज्जन व्यक्ति ने खरीदा वो रोजाना सुंदर सुंदर भजन गाता , श्लोक पाठ करता जिससे मैंने उससे श्लोक सीख लिए , और मेरे इस तोते भाई को एक चंडाल ने खरीदा जो प्रतिदिन आपस में गाली गलोच करता , जिससे यह गाली बकना सीख गया |

हे राजन ! संगति का बहुत बड़ा असर पड़ता है जो जैसी संगति करता है वैसा ही बन जाता है |किसी कवि ने ठीक ही कहा है –

संगति से गुण ऊपजै , संगति से गुण जाय |

बांस फांस औ मीसरी ,एकहि भाव बिकाय |

अर्थात सद्गुण से गुण उत्पन्न होते है तथा कुसंगति से गुण नष्ट होते हैं | जैसे मीठी मिश्री की संगति में बांस की फांस भी मिश्री के भाव ही बिकती है |अतः सभी सद्गुणों को अर्जित करके अपने जीवन को सफल बनाना चाहिए |

Add a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *